वर्चस्व की लड़ाई में हारती न्यायपालिका

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नई दिल्लीः भारत के न्यायिक इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब हाई कोर्ट के किसी कार्यरत जज को अदालत की अवमानना का दोषी मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जेल भेजने का आदेश दिया हो। सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की संवैधानिक पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्नन को कोर्ट की अवमानना का दोषी माना और 6 महीने की सजा भी सुनाई।

क्या कहा सर्वोच्च न्यायालय नेः

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली सात वरिष्ठतम न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि जस्टिस कर्नन ने न्यायपालिका और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर अवमानना की है।

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(जस्टिस सीएस कर्नन)

अतः सीएस कर्नन को न्यायालय की अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने कारावास की सजा सुनाई जाती है।

कोर्ट ने सजा तत्काल प्रभाव से लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को टीम गठित कर कर्नन को गिरफ्तार करने का आदेश लागू करने को कहा है।

क्या था मामलाः

पूर्व में मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्नन ने कनिष्ठ अधिकारी नियुक्ति विवाद में सहयोगी जजों के खिलाफ सुनवाई शुरू कर दी। सहयोगी जजों ने कर्नन पर मानहानि का केस कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से यह मामला रूका।  जस्टिस कर्नन का तबादला कलकत्ता हाईकोर्ट कर दिया गया।

जस्टिस कर्नन ने 23 जनवरी को 20 मौजूदा और रिटायर्ड़ जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए जॉच के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा।

जस्टिस कर्नन ने मद्रास हाईकोर्ट की कुछ महत्वपूर्ण फाइलों को लौटाने से मना कर दिया, जिन पर वह कार्य कर रहे थे।

8 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्नन के खिलाफ अवमानना का नोटिस जारी कर दिया। पुलिस घर पहुँची और जस्टिस कर्नन ने इसे एक दलित को बेवजह परेशान करने वाला कदम बताया।

सर्वोच्च न्यायालय की 7 जजों की पीठ ने जस्टिस कर्नन पर जुड़ीशियल ओर एड़मिनिस्ट्रेटिव काम करने पर रोक लगा दी।

कर्नन ने सोमवार को चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर के साथ सात अन्य न्यायाधीशों को पांच साल सश्रम कारावास की सजा सुना दी। उन्होंने 28 अप्रैल को दिल्ली स्थित एयर कंट्रोल अथॉरिटी को निर्देश दिया था कि केस खत्म होने तक चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के सात दूसरे जजों को देश के बाहर यात्रा करने की इजाजत न दी जाए।

उन्होने अपने 12 पन्ने के आदेश में कहा था कि आरोपियों ने ‘अनुसूचित जाति/जनजाति (प्रताड़ना से संरक्षण) अधिनियम-1989 और संशोधित अधिनियम-2015’ के तहत दंडनीय अपराध किया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्नन को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने की सजा सुना दी है। अदालत ने कहा कि जस्टिस कर्नन ने सारी सीमाएं लांघ दीं।

क्या है फैसलाः

प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि जस्टिस कर्नन ने न्यायपालिका और न्यायिक प्रक्रिया की गंभीर अवमानना की है।

सर्वोच्च न्यायालय की इस बेंच ने जस्टिस कर्णन के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए अवमानना कार्यवाही शुरू की थी।

पीठ ने जस्टिस कर्नन को 6 महीने की सजा भी सुनाई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी है कि वो जस्टिस कर्नन के किसी भी बयान को ना तो छापेगा और ना ही टीवी पर दिखा सकेगा।

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस कर्नन के मानसिक स्वास्थ्य की जांच का आदेश दिया था, लेकिन जस्टिस कर्नन ने जांच से मना कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि कर्नन को सजा इसलिए दी जा रही है क्योंकि उन्होंने खुद यह ऐलान किया था कि उनकी दिमागी हालत ठीक है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अवमानना के मामले में यह नहीं देखा जा सकता है कि ऐसा एक जज ने किया है या आम शख्स ने।

जस्टिस कर्नन भारतीय न्यायिक व्यवस्था के इतिहास में पहले ऐसे जज होंगे, जिन्हें पद पर रहने के दौरान जेल भेजे जाने का आदेश दिया गया है।

मीड़िया पर रोक और न्यायालय की अवमाननाः

सर्वोच्च न्यायालय ने मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी है कि वो जस्टिस कर्नन के किसी भी बयान को ना तो छापेगा और ना ही टीवी पर दिखा सकेगा। इस संदर्भ में न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971  की कुछ पंक्तियॉ महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

 

न्यायालय की अवमानना अधिनियम
(न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971)
न्यायालय की अवमानना अधिनियम२
(न्यायालय की अवमानना अधिनियम 1971)

छोड़ जाता है कुछ अनुत्तरित प्रश्न :

सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय स्वीकारा तो जाएगा ही, परन्तु क्या इन प्रश्नों के जवाब जनता को नहीं चाहिएः

  1. संवैधानिक पीठ के निर्णय को वरीयता तो प्राप्त होगी ही, परन्तु क्या यह सोचनीय नहीं था कि किसी भी मामले में यदि जज के हित, वादी अथवा प्रतिवादी से जुड़े हों, तो नैतिक आधार पर न्यायाधीश को स्वयं को उस विषय पर निर्णय देने वाली पीठ से अलग कर लेना चाहिए? क्या सर्वोच्च न्यायलय की 7 जजों की संवैधानिक पीठ में से किसी एक भी न्यायाधीश ने इस प्रकार की बातों को विचारार्थ रक्खा था?
  2. विधायिका और कार्यपालिका पर अनेक आपत्तिजनक बयानबाज़ी करने वाली न्यायपालिका, आज अपनी सकारात्मक आलोचना करने पर भी क्यूँ पाबन्दी लगा देना चाहती है? क्या न्यायपालिका सर्वोच्च हो चुकी है?the-constitution-of-india
  3. एक आपसी वार्तालाप में यह भी कहा गया कि सर्वोच्च न्यायलय ने NJAC कानून को भी असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बाद समान नागरिक संहिता पर सर्वोच्च न्यायलय का यह कहना कि कानून बनाने का काम संसद का है, विचारणीय हो जाता है। क्योंकि यह कानून भी संसद द्वारा ही पारित हुआ था।
  4. जाति, धर्म और लिंग आधारित मुद्दों के न्यायपालिका में प्रवेश पर सर्वोच्च न्यायलय मौन हो जाता है, परन्तु क्या जब देश में जनगणना के इतर, धर्म आधारित जनगणना हो सकती है, तो न्यायपालिका से सम्बंधित आंकड़ें भी तो जारी किए ही जा सकते हैं।

 

अंततः, जनता यदि यह जानना चाहती है कि जस्टिस कर्नन का क्या मत था, तो वह कहाँ से जान पाएगी? जब न्यायपालिका आतंकवादी मामले में भी दोनों पक्षों को सुनने की वजह से, मामले में वर्षों लगा देती है, तो क्या न्यायपालिका के इतिहास में हुआ यह अविस्मरणीय फैसला, जनता एकपक्षीय सुनेगी?

 

न्यायपालिका स्वतंत्र है, संविधान की व्याख्या कर इसको अपने अनुसार व्यवस्थित करने में (कोलोजियम व्यवस्था संविधान में वर्णित नहीं), परन्तु वो यह भी तो ध्यान रक्खे ना, भारत एक लोकतांत्रिक,गणतंत्रात्मक देश है। (http://lawmin.nic.in/coi/preamble.pdf)

 

संविधान प्रस्तावना
(संविधान प्रस्तावना)

Post Author: Vireshwar Tomar

पत्रकार, सामाजिक-आर्थिक लेखक, ब्लाँगर...।

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