कोचिंग का फैलता जाल और उसमें फंसते बच्चे; एक विश्लेषण

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मार्च से लेकर मई तक का महीना हर बच्चों के लिए महत्वपूर्ण समय होता है। पहले बारहवीं की परीक्षा और उसके बाद, उनके सपनों के आगे की राह की मुश्किलें, हर बच्चे और उनके माता-पिता की चिंता का मुख्य विषय होता है। क्यूंकि हर माता-पिता को इस गला काट प्रतियोगिता के लिए अपने बच्चों को तैयार करना होता है। उन्हें अच्छी शिक्षा देने के लिए वो हर कोशिश करते है।

इसी कोशिश में वह अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा, बड़ी-बड़ी कोचिंग संस्थानों में भी लगाने से नहीं हिचकते। बारहवीं के बाद देश में बड़ी संख्या में बच्चे आईआईटी और मेडिकल कोचिंग के लिए कोचिंगसंस्थान का रुख करते है। इसी का परिणाम है कि आज कोचिंग का मकड़जाल, पूरे देश में पूरी तरह फ़ैल चुका है। ये कोचिंग सेंटर, सिर्फ आईआईटी, मेडिकल तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आज के समय में उच्च शिक्षा से लेकर स्कूली शिक्षा तक के लिए एक जरूरत बन चुकी है।

बनते जा रहे हैं गढ़:

राजस्थान का कोटा आईआईटी, मेडिकल कोचिंग का गढ़ बन चुका है। वहीं दिल्ली के मुखर्जी नगर की गली में आईएस ऑफिसर बनने का सपना लिए लाखों की संख्या में दूर दराज से बच्चे आते हैं। स्कूली शिक्षा में भी टीचर, क्लास में कम पढ़ाई और ट्यूशन पर अधिक जोर देते नजर आते हैं।

Mukharjee Nagar
(दिल्ली का मुखर्जी नगर)

परिणामस्वरूप स्कूल की शिक्षा लचीली होती चली गई। इसका फायदा प्राइवेट कोचिंग संस्थानों को मिलता गया। वहीं पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी पाने के लिए भी कोचिंग का सहारा लिया जाने लगा है। आज एस.एस.सी., बैंकिंग, रेलवे से लेकर ग्रुप डी तक की कोचिंग हर शहर में मौजूद है।

दास्ताँ-ए-कोचिंग संस्थान:

  • आईआईटी के लिए हर साल 14 लाख छात्र प्रवेश परीक्षा में बैठते हैं, लेकिन इस परीक्षा में 10,000 से भी कम चुने जाते हैं।
  • सरकार का अनुमान है कि इस समय देश में यह व्यवसाय करीब 272 अरब रुपए बन गया है।
  • कोटा में कोचिंग करने के लिए सिर्फ 6 राज्यों से 85% छात्र आते हैं।
  • आंकड़ों की मानें तो हर साल कोचिंग संस्थानों द्वारा हजारों करोड़ की कमाई की जाती है।
  • कोचिंग सेंटरों द्वारा एक से पांच लाख तक की मोटी रकम जमा कराई जाती है।
Coaching
कोटा का एक कोचिंग संस्थान )
  • कोचिंग सेंटर में तैयारी करने के लिए हाँस्टल में रहने के लिए, सात से पन्द्रह हज़ार रुपए वसूले जाते हैं।
  • कोटा में लगभग 300 से भी ज्यादा कोचिंग इंस्टीट्यूट मौजूद हैं।
  • अच्छे कोचिंग इंस्टीट्यूट की फीस लगभग 1.2 लाख रुपए से लेकर 2.8 रुपए सालाना तक होती है।
  • सरकार ने अमित मिश्रा कमेटी बनाई थी और इस कमेटी ने केन्द्र को अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग सेंटर में हर साल 24,000 करोड़ रुपए कमाते हैं।
  • राजस्थान का कोटा शहर निजी कोचिंग का सबसे बड़ा केंद्र है जहां करियर पॉइंट, बंसल, एलन जैसी तमाम संस्थाएं आईआईटी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करा रहे हैं।
  • दिल्ली में आईएएस के लिए वाजीराव, चाणक्य, एएलएस जैसे तमाम संस्थान हैं, हैदराबाद में श्री चैतन्य नारायण, देहरादून में प्रयास आईएएस जैसे बड़े संस्थान कोचिंग उपलब्ध करा रहे हैं।

एसोचैम सर्वे के परिणाम:

  • एसोसिएटिड चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) के एक सर्वे के अनुसार मेट्रो शहरों में प्राइमरी स्कूल के 87 फीसदी और हाईस्कूल के 95 फीसदी बच्चे निजी कोचिंग लेते हैं।
  • एसोचैम के अनुसार भारत में निजी कोचिंग इंडस्ट्री हर साल 35 फीसदी की दर से बढ़ रही है।
  • एसोचेम के मुताबिक भारत में 35 फीसदी की दर से कोचिंग का धंधा बढ़ रहा है, और देश में मध्यम वर्गीय अपनी आय का एक तिहाई हिस्सा कोचिंग में खर्च कर रहा है ताकि उनके बच्चे जटिल और कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में पास हो सकें।

एनएसएसओ ने भी कराया है सर्वे:

Coaching Students
(कोचिंग के बाहर रिजल्ट के इंतज़ार में)
  • नैशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश भर में 7.1 करोड़ स्टूडेंट्स प्राइवेट ट्यूशन ले रहे हैं, जो विद्यार्थियों की कुल संख्या का 26 फीसदी है।
  • एनएसएसओ के ये आंकड़े 2014 के पूर्वार्ध में किए गए 66 हजार घरों के सर्वे पर आधारित हैं।
  • 2011 की जनगणना रिपोर्ट ने देश में कुल स्टूडेंट्स की संख्या 31.5 करोड़ बताई थी, जबकि एनएसएसओ के हिसाब में यह संख्या 27.3 करोड़ मानी गई। इस लिहाज से देखा जाए तो प्राइवेट कोचिंग करने वाले छात्रों की संख्या और ज्यादा हो सकती है।
  • 89 फीसदी से भी ज्यादा लोगों का जवाब था कि उनकी कोशिश अपने बच्चों की बुनियादी शिक्षा का स्तर सुधारने की है।
  • गौर करने की बात है कि इस मामले में परिवार की आर्थिक पृष्ठभूमि की कुछ खास भूमिका नहीं है। अमीर ही नहीं, गरीब परिवार भी बच्चों को ट्यूशन दिलाने की जरूरत पूरी शिद्दत से महसूस करते हैं।

अवसाद और आत्महत्याओं में भी बढ़े हैं आंकड़ें:

Depression

  1. इतनी महंगी फीस देने के बाद भी जब बच्चें इन प्रवेश परीक्षा में सफल नहीं हो पाते तब वो अवसाद के शिकार हो जाते है और मौत के आगोश में समा जाते हैं।
  2. कोटा सिटी पुलिस के आंकडे़ बताते हैं कि सन 2015 में इन कोचिंग संस्थानों में पढऩे वाले करीब 30, साल 2014 में 14 और 2013 में 26 छात्रों ने आत्महत्या की थी।
  3. कोटा के मनोचिकित्सक डॉ. एमएल अग्रवाल बताते हैं कि इन कोचिंग संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे अन्य बच्चों के मुकाबले 25 फीसदी ज्यादा अवसाद के शिकार हैं।

शिक्षा प्रणाली पर उठाते हैं सवाल:

आज हर गली मोहल्ले में आई.आई.टी , मेडिकल, आई.ए.एस और अन्य कई कॉम्पटीशन की कोचिंग कुक्कुरमुत्तों की तरह हर जगह मौजूद हैं।

आखिर इतनी कोचिंग खुलने की वजह क्या हैं? क्या हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी लचीली और ध्वस्त है, कि हर माँ बाप को अपने बच्चों के सपने को पूरा करने कई लिए एक अच्छी खासी मोटी रकम उन कोचिंग सेंटर को देने पड़ती है। जो एडमिशन के समय या अपनी बुकलेट में बड़े बड़े वादे करती हैं, हर बच्च्चें के सपनों को पूरा करने की लिए। जो बाद में सिर्फ वादें तक ही सीमित रह जाती हैं…!

ये कोचिंग सेंटर, मनमाने ढंग से दिन पर दिन अपनी फीस में बढोतरी कर रहे हैं। शायद इसकी वजह, कोचिंग में दिनों दिन बढते बच्चें की संख्या है। आज स्कूल से ज्यादा विद्यार्थी कोचिंग जाते हैं। आज विद्यार्थी अपनी पढ़ाई के लिए स्कूल से ज्यादा कोचिंग सेंटर पर निर्भर होते जा रहे हैं। क्या कोचिंग समय की मांग है या स्कूलों में शिक्षक का ईमानदारी से न पढ़ाने का परिणाम ?

करना होगा पुनर्विचार:

Rethink

हमारी शिक्षा प्रणाली भी पूरी सिस्टम का शिकार हो चुकी है। इसी का कारण है कि आज आई.आई.टी. में वही बच्चे कामयाब हो पाते हैं, जो “कोटा फैक्ट्री” से लाखों खर्च कर के उनका प्रोडक्ट बनकर आते हैं। या फिर ऐसे ही किसी और महंगी कोचिंग से। जाहिर सी बात है, इतने पैसे वही दे पाएंगे, जिनके पास उतने पैसे हों और बिना कोचिंग के आई.आई.टी में सलेक्शन आज के समय में ना के बराबर होता जा रहा है।

इस सब से यही साबित होता है, कि हमारे भारत में जिसके पास पैसे हैं, वही कामयाब भी जल्दी होता है। आज शिक्षा को पैसे से जोड़ दिया गया है। यहाँ शिक्षा से ज्यादा, पैसे को पहली प्राथमिकता दी जाती है और बोला जाता है “पढ़ेगा इण्डिया तभी तो बढ़ेगा इण्डिया”

ये टेगलाइन सुनने या सिर्फ पढ़ने में ही ज्यादा अच्छी लगती है, क्यूंकि इसकी ज़मीनी हकीकत तो इसके उलट ही है। जब यहां शिक्षा से पहले पैसे को अपनाया जा रहा है। स्कूल, कॉलेजों में पढ़ाई के नाम पर सिर्फ कुछ लेक्चर दिया जाता है। आज हर पढ़ाई के लिए महंगी कोचिंग का सहारा लिया जाता है, तो फिर “कैसे पढ़ेगा इण्डिया और आगे बढ़ेगा इण्डिया “……!

 

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Post Author: Vineeta Mandal

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